Monday, 16 September 2013

सार




पंचतत्व से बना, तू आज क्यो निराश है,
गूँज रहा हर तरफ, ये तेरा अट्हास है,
क्यों रुक रहा, तु थम रहा, क्या जीव तेरा मर गया?
वो देख पिछडे कायरो का, कफिला निकल गया,
तु हो खडा तु बढ जरा, ना खुद का सर्वनाश कर,
खुद ही खुद को मार कर, तु ऐसे न विनाश कर,
तेरे जैसे कई यहाँ, आये और गुजर गये,
जो अंत तक टिके रहे, वो महके और सँवर गये,
रगड रगड के उम्र भर, वो स्वर्ण से दमक गये,
कदम अभी उठे ही थे, की तुम अभी से थक गये?
मखमली ये चदरे, तु राह से उधेड दे,
अपने पैरों के निशान, तु वक्त पे उकेर दे,
मनुष्य है मनुष्य तू, सत्य का तू ज्ञान कर,
वक्त कुछ ही शेष है, इस पे भी विचार कर,
रण मे कर्म युध्द के, जो हाँथ कई छूट गये,
व्यर्थ वक्त मत गवाँ, ना ध्या उन्हें जो रूठ गये,
रखे हर एक को सुखी, ये तेरा लक्ष है नहीं,
चमक रहा जो आँख मे, ध्यान बस लगा वहीं,
जो कर सका ये फैसला, तो जिंदगी का सार है,
नही तो अंत तक तेरे, सफर मे ही विकार है,
सफर मे ही विकार है...

Sunday, 28 July 2013

असमंजस


असमंजस मे बैठ के जब तू, खुद से प्रश्न उठायेगा,
रूह से खुद की चुप्पी का, एक सन्नाटा सा पायेगा,
ना भाग सकेगा जीवन से, ना मंजिल तय कर पायेगा,
जब सुन्दर स्वर्णिम सा सपना, हर तरह बिगडता जायेगा,
हर राह मे काँटे होंगे और, हर खुशी गलत मुड जायेगी,
जीने से ज्यादा मरने की, जब चाहत तुझे लुभायेगी,
जब राह मे बस तू ही होगा, चहुँ ओर तेरी छाया होगी,
तू ही तेरा दुश्मन होगा, और जंग तेरी खुद से होगी,
फिर देख मजा उस बाजी का, जब तू खुद का प्रतिरोधी हो,
जब हार जीत के अंतर का, तीजा ना कोइ विरोधी हो,
जिस दिन खुद पर काबू पाकर, ये  चक्रव्यूह तू भेदेगा,
और धूल भरे उन प्रश्नों की, परतों को पुनः खुरेदेगा,
तब सभी जटिलता  प्रश्नों की, अपने आप सरल हो जायेगी,
फिर सूरत धूमिल ख्याबो की, कुछ और सवर सी जायेगी,
चाह तेरी क्या हैं खुद से, तू साफ साफ सुन पायेगा,
जिस तरफ उठायेगा पग को, उस ओर रास्ते पायेगा,
फिर असमंजस मे बैठ के जब तू, खुद से प्रश्न उठायेगा,
तब उत्सुकता मे जीने की, तू वक्त सिमिटता पायेगा, तू वक्त सिमिटता पायेगा,