Thursday, 6 August 2015

इज्ज़त के बदले यहाँ कौंणियाँ फेंकी जाती है,
इंसानियत आज पैसों मे तौली जाती है,
मिलावट की इंतहाँ पार हो गइ,
ये भारत है मेरे दोस्त,
यहाँ पैकिट मे भर के बिमारियाँ बेची जाती हैं,

किसी के शौक से छोटी है आदमी की जिंदगी,
सत्ता मे जनता पर बोली खेली जाती है,
रोटी दाल का धंधा हुआ पुराना अब,
आज किसी की ज़िन्दगी और मौत खरीदी जाती है,

विकास शब्द का यहाँ अलग ही मतलब है,
किसान की लाशो पे होली खेली जाती है,
हिन्दी,अंग्रेजी संस्क्रत सब मौन हो गइ,
बस पैसो की भाषा देश मे बोली जाती,

~आरोही




Thursday, 30 July 2015

भावपूर्ण श्रद्धांजली


एक महा पुरुष मुख तेज़ लिये ,इस तरह अमर हो चला,
हर ओर ग्यान का दीप जला,वो दिव्य ज्योत हो चला,

नये पैमाने जीवन के ,आवाम को अपनी सिखा गये,
जीवन की अंतिम सीढ़ी पर, हर लव्ज़ वो अपना निभा गये,

नन्हे बच्चो की अंजुल मे ,देश सवरता देखा था,
रोड़ो से महल बनाने का ,वो पाठ अनोखा पढ़ा गये,

कलाम को सबकी कलम बना, भारत का नक्शा खींचा है,
हर रंग की स्याही से उन्ने ,देश को अपने सींचा है,

बच्चे हो या बूढ़े हों , हर ह्रदय आज कुछ नम सा है,
खोया है एसा रत्न आज, की "देश" आज कुछ कम सा है,

अश्रुपूर्ण है नभ सारा , धरती का सीना बैठा है,
है स्वर्ग दिवाली मना रहा, और देश हमारा रोता है,

~आरोही

Friday, 26 June 2015

"मै" ही "मै"

दूसरों की जय से पहले, जो खुद की ही जय हो,
व्यर्थ है एसा जीवन जिसमे बस "मै" ही "मै"हो,
उठ जाओ भले कितने उँचे,पैर धरा को छूते हों,
बाँट दो रोटी भूखों को, खुद कितने भी भूखे हो,
पैसा वो कैसा पैसा है, जो काम न आए मौके पर,
धिक्कार है एसी दौलत को, पाइ जो चलकर औरो पर ,
पैर किसी के पेट पे रख, सड़कों पर खाना फिकता है,
इन्सान आदमी के भीतर, हर रोज़ शरम से मरता है,
चिथड़ो से कोइ तन ढाँक रहा, कोइ कपड़ों मे भी नंगा है,
कलयुग तक पीछे छूट गया, अब जिस्म रूह बस धंधा है,
हर कोइ नशे मे डूबा है ,चाहे पैसा हो या मय हो,
व्यर्थ है एसा जीवन जिसमे बस "मै" ही "मै"
हो,
~आरोही

Tuesday, 17 March 2015

सवेरा


आ लौट चलें उस बचपन मे जब रोज सवेरा होता था,
हर पहर को जब हम जीते थे ,और रात को सोना होता था,
जहाँ एक संतरे की गोली, आँसू को थामे रखती थी,
पतंग,गेंद, गिल्ली डंडा , बल्ले का खिलोना होता था,
आ लौट .....

जब रंग रूप की फिकर ना थी, तपते सूरज के ताप तले,
माँ के लाख बुलने पर जब घर को आना होता था,
कभी दर्द चोट का रहता, था कभी दूध मे हल्दी होती थी,
जब बारिश कि बुँदो के नीचे, कई बार नाहना होता था,
आ लौट.....

हर सुबह सुनहरी होती थी, जब रात को माँ की थपकी थी,
ना भूख कभी लग पाई थी, तैयार निवाल होता था,
हर गलती की माफी थी, और मार से बढकर साजा ना थी,
बस आँख मे आँसू आते थे , जब यारों से बिछुड्ना होता था
आ लौट चलें उस बचपन मे जब रोज सवेरा होता था,
हर पहर को जब हम जीते थे और रात को सोना होता था|
-आरोही

Sunday, 8 March 2015

नारी

निर्मल सी धारा हैं नारी,
एक क्रोध की ज्वाला हैं नारी,अड़ जाये तो माँग वो प्राण भी ले,
झुक जाये तो, द्रोपदी है नारी,
कमजोर कहो, नाजुक कह लो, अश्कों का समुन्दर है नारी,
गर शीश उठा वो दहक उठी, काली सा अंतर है नारी,
जो आँख झुका कर सब सह ले, हर चोट जिस्म पर भी लेले,
जो टूट गया वो बाँध दर्द का, विक्राल बवन्डर हैं नारी,
मुस्कान से वो दिल पिघला दे, बातों से स्वर वो बिखरा दे,
गर छेडा उसके तारो को तो नाद शँख का है नारी,
कभी दर्द मे वो मुस्काती है ,
कभी खुशी मे अश्क बहाती है,
आसान नही है सुलझाना अन्जान पहेली है नारी,
एक ह्रदय मे जग को भरे हुये ,रेशम सा बँधन है नारी,
स्वार्थ भरी इस दुनिया में खोई एक आशा है नारी,
प्यार , त्याग और रिश्तों की एक परिभाषा है नारी


Thursday, 26 February 2015

my mind is blank and i just want to quit, but the efforts that i put forces me to knit, i wonder at a moment , why i carried so far, is it just coz i heard about a half filled jar, i even want to keep and also want to loose, i have tonnes of option but i don't know what to choose, the bird which i target just flies before the shot, yes my head was such a noise i never gave a thought , i tried hard to gather the pieces i shattered, and keep myself walking, with my brains all together, things can be either easy hard or tough, its not u have to take always what is rough, life has stones and even blossoms all around, the path should be right,love all what you found, life may have different goals and different way of loving, it just makes sure that nothing gets boring, no matter how you push u will land to something better, its just a times matter sooner or later,

Thursday, 19 February 2015

i wish i could move to the world of mystery,
an unveiling future and unfold history,
i wish all i know again become question,
i just want to clear all addition and subtraction,
i dont want to think at least for a day,
i just want to lie apart from my way,
no more connection to the so solved world,
i just want to love all what is curled,
a slight move from so called life,
a break from the phase where all is divine,
i am not pure i am not clean i am not one world want me to be,
i dont want answer i dont want clue,
i just cant go blind with the crew,
yes i mad and insane and may sound silly ,
but that what i am , it may not sound willy,
my path may be rough and not so glittery,
still........
i wish i could move to the world of mystery,
~Arohi~