Thursday, 17 August 2017

रात

जो ये रात ढल जाये ,सवेरा जगमगाता हो,
छँटे जो अश्क़ के बादल, हर्फ़ फिर मुस्कुराता हो,
गिरना और समहलना तो, मुसाफ़िर का फँसाना है,
सफ़र ज़िन्दगी है ये, हमें हरगिज़ निभाना है,
डगर पर शूल भी आये,हमें अब हर्ज़ ही क्या है,
क़दम अब रुक नहीं जाये,यही बस अर्ज़ की आह है,
डगर अब लाख बल खाये, ज़हन में डर नहीं होगा,
जो दिल में लौ भड़क जाये,अंधेरा अब नहीं होगा,
सफर ये अंत तक का है,काफ़िर हमसफ़र होंगे,
ठहरना अब नहीं होगा,धरौदें अब नहीं होंगे,
मैं एहसासों का सौदागर,सफ़र तय करके आया हूँ,
किसी को खो कर राहों में, किसी को संग लाया हूँ,
निरंतर चल के आज मैं ,तुम तक पहुँच पाया,
ज़ख़्म टूटे हुए रिश्तों का, मुझको रोक पाया,
जो आँसू दर्द में बहके,वो आँसू पोंछ आया हूँ,
वो बिसरी प्यार की यादों को, ख़ुद में बाँध लाया हूँ,
उठे जब जब भी पग मेरे ,कभी वो बेवजह हो,
कभी जो आँख मिल जाये,किसी से रंजिशें हो,
सफ़र के अंत में मुझको,सफ़र का सार मिल जाये,
कभी गर मुड़ के देखूँ तो,मेरा कल खिलखिलाता हो,
जो ये रात ढल जाये ,सवेरा जगमगाता हो,

छँटे जो अश्क़ के बादल, हर्फ़ फिर मुस्कुराता हो,

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